केंद्रीय कर्मचारियों के लिए आठवें वेतन आयोग से जुड़ी एक ऐसी खबर सामने आई है जिस पर लाखों कर्मचारियों की नजर है। मामला है महंगाई भत्ते यानी डीए को बेसिक सैलरी में मर्ज करने का। अब सवाल यह है अगर डीए को बेसिक पे में मिला दिया गया तो कर्मचारियों की सैलरी पर इसका कितना असर पड़ेगा और क्या आठवीं वेतन आयोग में सरकार इस मांग को मान सकती है? चलिए पूरी कहानी बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं।
दरअसल आठवें वेतन आयोग अपनी सिफारिशें तैयार करने के लिए लगातार काम कर रहा है। आयोग के पास अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए और सरकार को सौंपने के लिए 18 महीने की डेडलाइन है। इसी सिलसिले में आयोग कर्मचारी संगठनों और दूसरे हित धारकों के साथ लगातार बैठकें कर रहा है। हाल ही में चेन्नई और पांडुचेरी में भी हितधारकों के साथ चर्चा हुई। इन बैठकों में केंद्रीय कर्मचारियों की कई मांगे सामने आई हैं। इसमें सबसे अहम मांगों में से एक है डीए को बेसिक पे में मर्ज करना।
अब यहां पर एक बात समझना जरूरी है। कर्मचारियों के प्रमुख संगठनों ने सुझाव दिया है कि जब डीए 25% से ज्यादा हो जाए तो उसे मूल वेतन यानी बेसिक पे में मिला दिया जाए। यह मांग नेशनल काउंसिल जॉइंट कलेक्टिव मैटनरी यानी एनसी जेसीएम ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लाइज फेडरेशन यानी एआईडीएफ और ऑल इंडिया न्यू पेंशन स्कीम एंप्लाइज फेडरेशन यानी एआईएपीएसईएफ की तरफ से रखी गई है। एआईएपीएसईएफ का तर्क है कि अगर डीए को बेसिक पे में मिला दिया गया तो कर्मचारियों की सैलरी में अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ोतरी हो सकती है। खासतौर से उन कर्मचारियों को इसका फायदा मिल सकता है जो निचले लेवल पर काम करते हैं और जिनकी सैलरी कम होती है और यह बात भी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़े शहरों में रहने वाले कर्मचारियों पर घर का किराया बच्चों की पढ़ाई आने जाने और रोजमर्रा के खर्च का दबाव ज्यादा रहता है।
एआईएपीएसईएफ का कहना है कि डीए को बेसिक में मर्ज करने से कर्मचारियों को बेहतर सैलरी बढ़ोतरी के लिए 10 साल तक का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। लेकिन सभी कर्मचारी संगठन एक ही आंकड़े पर सहमत नहीं है। भारतीय रेल परवेक्षक संघ और प्रगतिशील शिक्षक न्याय मंच ने सुझाव दिया कि डीए के 50% होने पर उसे बेसिक वे में मर्ज कर दिया जाना चाहिए। यानी असली बहस यह है कि डीए किस स्तर पर पहुंचने के बाद बेसिक सैलरी का हिस्सा बने। 25% पर या फिर 50% पर।
अब इसे एक उदाहरण से समझ लेते हैं। मान लीजिए किसी लेवल वन कर्मचारी की बेसिक पे ₹18,000 है। एनसीजेसीएम के आठवें वेतन आयोग को दिए अपने मेमोरेंडम में एक उदाहरण रखा गया। इसमें अगर फिटमेंट फैक्टर 2.1 माना जाए तो 1 जनवरी 2026 से संशोधित बेसिक सैलरी ₹37,800 हो सकती है। इसके बाद मान लीजिए कि कर्मचारी को हर साल औसतन 4% डीए बढ़ोतरी मिलती है। साथ ही सालाना इंक्रीमेंट की दर 3% से बढ़कर 7% हो जाती है। तो इस अनुमान के हिसाब से 1 जनवरी 2033 को उस कर्मचारी के अनुमानित ग्रॉस सैलरी यानी बेसिक पे और डीए को मिलाकर करीब 77,694 हो सकती है। यानी ₹37,800 की संशोधित बेसिक पे के मुकाबले यह रकम करीब 106% ज़्यादा होगी। अब यहां पर सबसे जरूरी बात इन आंकड़ों को सरकारी फैसला समझने की गलती मत कीजिएगा। डीए को बेसिक पे में मर्ज करने का सुझाव अभी सिर्फ कर्मचारी संगठनों की मांग है। सरकार ने इसे मंजूर नहीं किया है। इसी तरह 2.1 का फिटमेंट फैक्टर 7% इंक्रीमेंट और हर साल औसतन 4% डीए बढ़ोतरी। यह भी उदाहरण में इस्तेमाल किए गए एक अनुमान है। इन्हें आठवें वेतन आयोग का फाइनल फैसला नहीं माना जा सकता। यानी अभी कहानी यह है कि कर्मचारी संगठन अपनी मांग आठवें वेतन आयोग के सामने रख रहे हैं। आयोग इन सुझावों पर विचार करेगा। अपनी सिफारिशें तैयार करेगा और उसके बाद अंतिम फैसला सरकार के स्तर पर ही होगा। तो कर्मचारियों के लिए उम्मीद जरूर है लेकिन अभी इसे पक्की सैलरी बढ़ोतरी या डीए मर्जर का ऐलान मानना जल्दबाजी होगी। आने वाले वक्त में असली नजर रहेगी दो चीजों पर। पहली आठवें वेतन आयोग फिटमेंट फैक्टर पर और वेतन संशोधन को लेकर क्या सिफारिशें करता है और दूसरी डीए का बेसिक पे में मर्ज करने की कर्मचारी संगठनों की मांग पर सरकार का रुख क्या रहने वाला है। फिलहाल इतना समझ लीजिए डीए मर्जर की मांग जोर पकड़ रही है। लेकिन फैसला अभी बाकी है।
